इसे कहते हैं धोखा

इसे कहते हैं धोखा।
कैसी बराबरी?
महिलाओं को पुरुषों के साथ ला खड़ा करने के नाम पर उनकी इज़्ज़तें लूटने की बराबरी?
समानता के नाम पर उनके कपड़े उतार कर विज्ञापन बनाने की बराबरी?
अधिकारों के नाम पर उनके स्वाभिमान को कुचलने की बराबरी?
उन्हें यह एहसास दिलाने की बराबरी की तुम साथ खड़ी होजाओ पर अब भी कमजूर हो, हमारी हवस मिटाओ तो आगे बढ़ोगी !
फिल्मों में हीरोइन बनाना हो या जिस्म फ़रूषी की नाएका, हर समाज में  इसे पैसा फेंककर खरीदना फिर उस से जो चाहे करवाने की बराबरी?
उसकी मर्ज़ी हिजाब हो फिर भी उसे ज़बरदस्ती नंगा करने के बराबरी?
जो जिम्मेदारियां पुरुष पर  ज़रूरी हैं वह स्त्री पर लाद कर समाज को मादर पिदर 'मुक्त' करने की बराबरी?

और फिर मुसख्खर कर के इस घिनौनी "जीत" का  विश्व दिवस (ढकोसला) मना कर खुद को महान साबित करने की बराबरी?

लानत हो ऐसी सभ्यता पर जो प्रकृति के खिलाफ जाये।
और लानत हो ऐसी लेबरल सोच पर जो प्रकृति के खिलाफ जाये।

लानत हो ऐसी धर्मनिरपेक्ष सोच पर जो एक लिंग को पृथ्वी का भगवान और दूसरे लिंग को बे हया गुलाम बनाये।

और लानत हो ऐसे लोकतंत्र पर जो प्रत्येक विद्वान और अज्ञानी की मर्ज़ी के अनुसार बहुमत की राय पर क़ानून बनाये।

लानत हो ऐसे शिर्क व कुफ़्र अकबर पर जो अल्लाह द्वारा अता की गई पूर्ण व्यवस्था के खिलाफ एक गिरी हुई व्यवस्था लाये।

लानत हो उन पाखंडीयों पर जो इसके बाद हर पाप को "इस्लामी" लगा कर  बुराई को अच्छाई बताये।
याद रखें कि जो चीज़ सामान्य नहीं है वहाँ सामान्यता नहीं  अदल व इंसाफ लागू होता है।

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